आशा

न आशा है आस की,
और न ही परिहास की।
न परेशानी ही कोई,
और न ही हैरानी।
न बैरभाव ही कोई,
मगर प्रीति भी तो नहीं।
न कोई कष्ट है तुमसे,
न कोई दुःख दर्द बांटने की आशा।
जो हुआ सो हुआ,
ये हम भी जानते हैं,
और तुम भी।

जो नहीं जानते है,
अब वह भी जान जायेंगे।
जो नहीं पहचानते है,
अब वह भी पहचान जायेंगे।
जो धीरे धीरे जान रहा है,
वह धीरे धीरे पहचान भी रहा है। जिसने अब तक जाना है,
वे उठ रहे है पूर्व की और।
युहीं,
धीरे धीरे जग जाग रहा है,
नयी दिशा की और।

जग से भले न हम हैं,
और न ही तुम।
माना, जो हुआ सो हुआ,
ना इसमें हाथ हमारा है,
और न ही तुम्हारा।
मगर जितना जग हम जानते है,
और जितना तुम।
जितना जग हम पहचानते हैं,
और जितना तुम,
ये तुमने अच्छा नहीं किया,
ये तुमने अच्छा नहीं किया।
ये तुम भी जानते हो,
ये तुम भी भलीभांति पहचानते हो।

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